Saturday, 6 April 2013

जब मौन ना समझा जाये तो , कुछ कहना व्यर्थ है 
जब आँसू ना पौंछे जायें तो , अभिव्यक्त करना व्यर्थ है 
अपने आप को ही समझाना , बचाना और सुधारना  कारगर उपाय है .....
......प्रार्थना .........

Friday, 5 April 2013

तुमने सींचा , मुझे जो ऐसे है कि अब मुझ में भी फूल खिलने लगे हैं ....
तुमने गुड़ाई , मेरी जो की है कि अब मैं भी गहरा गई हूँ ....
तुमने छाँट , मुझे जो ऐसे दिया है कि अब मैं भी मजबूत हो गयी हूँ ....
तुमने हरा-भरा , जो कर दिया है कि अब मैं भी छाँव देने लगी हूँ ....
[ कोशिश जारी है ...]
.......प्रार्थना .........
मनन .....
"द्वंद "...क्या अच्छा है , क्या बुरा है , क्या गलत है , क्या सही है , क्या करना चाहिए था , क्या करना चाहिए और क्या नहीं ......ये सब वर्तमान परिस्थिति ,  मौके , हालात और उस समय निर्णय  लेने पर निर्भर करता है ......जो ठीक लगा , वह किया ...इसलिए द्वंद में रहने से , दोषारोपण और स्वयं  को दोषी मानने से बेहतर है कि हम आगे की सुध लें .....और ठोकर लगने से पहले ही सतर्क हो जायें ......
[ मेरी तो स्थिति बेहतर ही हुई है ...]
.....बस यूँ ही एक विचार ......
........प्रार्थना .......

Thursday, 4 April 2013

मनन ....
शून्यता .......[ Break even point ]....एक भाव है जो कि जीवन के थपेड़े खा कर ही जीवन में उतरता है ......जब हम आस-पास का माहोल ....इंसान .....परिस्थितियों ......से मुखर हो ......कुछ अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए निर्णय लेने लगें ......स्वयं अपने लिए .....सुधार के अनुकूल सोचने भी लगें , यह बहुत ही जरूरी है ......[मेरी कोशिश शरू हो गयी .....]....
जब जीवन में " शून्यता " का एहसास होने लगे ....तो समझिये कि ..... ये हम अब पूर्णता की ओर अग्रसर होने लगे हैं या होंगे ....
बस यूँ ही एक विचार .......
..........प्रार्थना .......

Sunday, 24 March 2013

मनन ....
" रिश्ते "....इन के बारे में तो अनेक धारणा - अवधारणा गाढ़ी ही जा चुकीं हैं ....क्या कहें ...पर जैसे सभी कहतें हैं कि इन्हें पाला ... , सजोंया ... , निभाया ... , बनाया ...., बोया ....,जाता है ....क्या रिश्ते भी या रिश्तों को दिमाग के अनुकूल उनमें या उनकी उठा-पटक , ऊपर - नीचे , आगे -पीछे , आगे - पीछे , कम - ज्यादा ....किया जा सकता है ....मेरी तो समझ से परे है ........या जो किया करते हैं वो रिश्ते  मन से नहीं अपितु , दिमाग से ...चालाकी से ....जरुरत के हिसाब - किताब कर के खुद समझते और समझाते हैं .....इनको अगर आपसी विश्वास ....समझ .....से परख कर सींचा जाये तो बेहतर जाये ......वरन गुलाब तो किताबों में भी मिलते हैं पर महकते नहीं .....सिर्फ याद और दिखने भर के .....पर असली को तो सिर्फ कुछ देर पकड़ने पर भी ...हथेली  को महका जाते हैं .......और मन की कली महक जाती है .......बस यूँ ही एक विचार .....
[ वैसे भी आजकल बुफ्फे का जमाना है .....जिसे मन चाहा उठाया .....पूरी थाली परोसने का नहीं .....कि आपको खाना या फिर थोडा बहुत चखना ही पड़े ....]
...........प्रार्थना ......

Monday, 11 March 2013

मनन ......
" प्रार्थना "......मन का एक निर्मल भाव .....जहाँ हम , अपने द्वेष ...कपट और क्रोध से ऊपर उठ कर , ईश्वर से एकाकार होने की कोशिश करते हैं ....उस समय का प्रभाव इतना हम पर गहरा होता है कि हम खुद ही अपना स्तर उठा देते हैं .....हमारा " भाव " और " हम " ईश्वर की प्राथमिकता बन जाते हैं .....क्यों कि ...जब हमने किसी के हित में कुछ सोचा या बोला और वह स्वतः ही पूर्ण हो जाता है .....यही इसका प्रमाण है ....स्वार्थ से परे यह सरल - भाव ...की " प्रार्थना ".....का परिणाम है ......बस एक भाव......
.........प्रार्थना ........
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Tuesday, 26 February 2013

मनन ......
" ईश्वर ".....क्या है ....क्यों है ....कहाँ है......यह प्रश्न तो हमारे मन में आने पहले भी चिर काल से चला आ रहा है .....यद्धपि ये खोज अभी निरंतर जारी है .....पर इसका प्रारूप बदल दें तो जयादा समझ पायेंगे .....
" ईश्वर " कोई गगन के परे सिंहासन पर विराजमान मात्र प्राणी नहीं है वरन एक ऊर्जा के स्त्रोत है ....जिसका और जिसे हम महसूस कर सकते हैं स्वयं में ....एक तरह से उसका संचार हमारे माध्यम से होता है ......और यह हमारे ही द्वारा अभिव्यक्त और विस्तृत रूप लेता रहता है ......और हम रम जाते हैं.......कोई संत - गण तेजोमय होता है उसकी संगत से शीतलता क्यों बरसती है ....ओर कुछ इंसानों से भी यही झलकता है .......आखिर क्यों हमें उनसे डर  नहीं लगता ???....क्या है उनमें ?? 
"डर " से याद आया कुछ लोग डर - भय से आस्तिक हो जाया करते हैं , ये करो नहीं तो ?? वो करो नहीं तो ?? इतने व्रत करो नहीं तो आदि - आदि .....[ वैसे तो डर हमें गलत कार्यों से बचाता भी है ...एक फायदा तो है ही ........]   किसी भी सद-ग्रन्थ में ऐसा व्य्खायन नहीं है .....व्रत हमारे सयंम और अनुशासन के लिया बनाये गए हैं जिससे हमारा जीवन सुचारू रूप से चल सके और हम आस्थावान जीवन परयन्त्र बने रहे ...हमारी भी.....पीढीयां भी ....
खैर बहुत सी बातें है ...विचार विमर्श चलते आयें हैं और आगे भी चलते ही रहेंगे.....यह कोई बहस का मुद्दा नहीं है .....एक सरल विचार है .....मेरे अनुरूप यह ज्ञान और आस्था का सम्मिश्रण  है ......भाव है,.....विश्वास है ,.....श्रद्धा है ......मात्र है .....कभी हम उसे पूजा घर में सजा लेतें हैं ...और कभी इंसानों में खोजने लगते हैं.......कभी कभी भगवान इंसान हो जातें हैं और इंसान भी भगवान ......

[यह एक विचार ही है .....कृपा इसे यूँ ही बनाये रखें ....वैसे आपके विचारों का स्वागत है ......मुझे पड़ना अच्छा  लगेगा ......]
...........प्रार्थना ...........