Tuesday, 16 August 2011

मैं

तुझसे और क्या माँगू  ?

जब मेरे नैनों का आँचल ही भीग जाता है...

तुझसे और क्या चाहूँ?

जब मेरी चाहत का प्याला ही छलक जाता है.....

तुझसे और क्या सुनूँ ?

जब मेरे ध्यान में तेरी, मौन की गूंजें भर जाती हैं....

तुझसे और क्या पाऊँ ?

जब मुझे स्वयं में ही खो जाने को जी चाहता है....

तुझसे और क्या अरज करूँ?

जब मेरा हृदय ही तेरे प्रेम से भर जाता है....
मेरे प्रभु!!!!
बंधन स्वीकार करो मेरा

जो रिश्तों से मुक्त हो,परे हो ....
जिसमें आत्मीयता की डोर हो,
जिसमें निष्कपटता के फूल खिले हों,
जिन्हें स्नेह-नीर से सींचा हों,
जिसमें मिलन की आस हो,
जिसको देख- गर्व समर्पण का हो.....

ऐसे बंधन से मैं तुम्हें बाँधना चाहूँ
यही है मेरा "रक्षाबंधन " है तुम्हें.....
मैं भी जी लेती हूँ ......

सपनो जैसे विशाल व्योम को देख,

धैर्य धर लेती हूँ धरा को देख,

अश्रु बहा लेतीं हूँ मेघ बन कर,

आवेगों को सामा लेती हूँ किनारे बन कर ....

यह सभी तुम्ही से तो सीखा है,

तुम्हारे पद-चिन्हों पर चल उन्हें गहरा देती हूँ......

Monday, 23 May 2011

तेरा स्नेह पा मैं धन्य हुई,
    जो तूने हृदय में प्रेम भर दिया .....
इस रीते घट में आनन्द भर दिया,
    जो हर पल छ्लके मेरे नयनों से
अपनी प्रेम-बोछार से भिगो दिया....

 तन-मन तृप्त हुए जैसे,अम्बर की फुहार से धरा
    सभी को अपने हृदय में पाया,
देखा -तू हर हृदय में समाया....

 यही तो है तेरी "प्रेम की मंजुषा "
     न निकलूँ कभी यही है "मेरी -आशा ".....

Wednesday, 11 May 2011

कान्हा ने ओढा पिला-पीताम्बर ,मैंने है नारंगी
     कभी तो मिलने की होगी आस पूरी .....

   कान्हा तो हैं सागर ,में तो हूँ गागर
         कैसे समाऊँ तुझे, तेरा स्नेह है अपार...

   जरा सा तुझे पाया ,मन तो इठलाया 
        पग-पग धीर न धरूँ, झलकता ही जाऊँ... 

    तुझे नजरों में भरूँ ,स्वयं को सबसे चुराऊँ
        मेरा ये कैसा दीवानापन है, तुझ में पाया जो अपनापन है....

   न सूझ रहा मुझे, किधर जा रही हूँ
       मालूम है मुझे, में सिर्फ तुझे पाती जा रही हूँ ....
        
तुझे पाया में इस तरह से कि.....

    मेरा मोल कहाँ रहा, मैं तो अनमोल हुई .....
    मेरा सुख  कहाँ रहा, मैं तो आनन्द  हुई....
     मेरा दुःख  कहाँ रहा ,मैं तो शांत  हुई....
     मेरा अँधेरा कहाँ रहा,मैं तो उजाला हुई....
       मेरा अस्तित्व कहाँ रहा, मैं तो भगत हुई......
     
मैं डूबी रहूँ प्रेम-सागर में और प्रेम-मग्न रहूँ भक्ति-भाव में...

     भक्ति की परत-दर-परत चढती रहे,
           प्रेम की प्रबलता मुझमें बढती रहे ....

    शान्त ह्रदय में  मैं सदा धीर धरूँ ,
          मौन के आनंद में सदा विचरूं ...