Monday, 25 February 2013


मनन
"आस्था ".......यह एक बचपन की घुटी की तरह विचार है ......जिसका स्वरूप श्रद्धा ...सपर्पण में बदल सकता है .....जो जरूरतों के हिसाब से आस्था बदलती रहती है.....वह चिरस्थाई है ये एक लहर की तरह शाँत हो जाया करती है......फिर आ-जाया भी करती है.....यह अगर स्वभाव में गहरी पैठ बना ले , तब यह आनंद का ....आनंद में ....स्थाई तौर पर हो गहरा हो जाया करता है.......तब बहने .....अभिवयक्ति .....भावों ....का प्रादुर्भाव का प्रारम्भ हो जाया करता है और वह भी चारों याम ......अर्थात व्यक्ति के निर्माण की प्रक्रिया और यहीं से आगे का मार्ग प्रशस्थ होता है.....
...........प्रार्थना ............

Saturday, 23 February 2013

मनन...... "आखिरी -पड़ाव".....
यहाँ की कोई बात नहीं करना चाहता,...न जाना चाहता है,....न कोई ले जाना चाहता है,....न इसके बारे में सुनना चाहता है,.....न सुनाना चाहता है,.....हम सभी इससे ुअनिभिग्य रहना चाहते है,....लेकिन यहाँ पहुँचते ही या देखते ही ....हम मौन हो जाते हैं,....शान्ति सी लगती है,......ठहराव सा पातें हैं,.....किसी की लालसा नहीं रहती,....अकेलापन लगता है ,......सब छूटता सा लगता है और मन में वैराग्य आता है , और हाँ !!!! मुझे ऐसा भी लगा की "मैं " हूँ .......आखिर क्यों ????
" माँ "..के अंतिम संस्कार के दूसरे दिन , मैं वहाँ दीपक रखने गयी थी .....मुझे वहाँ ऐसा ही लगा ....... 
बस यूँ ही एक विचार .....इससे अधिक कुछ नहीं.......
........प्रार्थना ..........

Wednesday, 20 February 2013

" बंधन  और आज़ादी "...कहने को तो विपरीतार्थक शब्द हैं , पर सोच और मानसिकता इन्हें और इनके प्रारूप को बदल देती है.....
क्यों की कभी बंधन में बंधे हुए भी हम और हमें आज़ादी का अनुभव और एहसास होता है,......और कभी - कभी हमें और हमारी आजादी में भी बंधन लगने लगता और कभी आवश्यकता महसूस होने लगती है......
बस यूँ ही एक विचार !!!!!
.........प्रार्थना .........

Tuesday, 19 February 2013

मनन 
" ईश्वरीय - संचार ".....यह एक गतिशील प्रक्रिया है, जो  एकाकार  होने के साथ-साथ , आपको और आपके जीवन को चलायमान करती और प्रक्रिया में आपको समायोजित कर देती है......यह एक इंसानी ..... मनः स्थिति भी है......जो समर्पण , श्रद्धा  , विश्वास और अच्छी  सोच-विचार को, जीवन में अग्रणी रख कर खुद को पथिक की भाँति जीवन यापन करता है .......
.........प्रार्थना .........

Sunday, 17 February 2013


ये जो मन की तपन है
तेरी छुअन से ही शांत होती है ......
ये जो तन की बहती धारा है
तेरे सागर से मिल के ही तृप्त होती है.....
ये जो मन की भटकन है
तेरी कुञ्ज-गलियों में पग धरते ही मौन हो जाता है......
ये जो तन की धरा है
तेरे एहसास को पा "हरश्रंगार "बन स्वतः ही बरसने लगता है.....
........प्रार्थना ..........

जब मन मौन होना चाहे ...तब जीवन का अर्थ बदलने लगता है 
और जब प्रार्थनाओं में आँसू बहने लगे ....तब जीवन का अर्थ मिलने लगता है.....
.......प्रार्थना ..........
परछाई बन चलूँ सदा तेरे पीछे 
और ये मन अब क्या चाहे तुझसे ......
प्यासी बनी रहूँ सदा तेरे ही प्याले की 
और ज्यों-ज्यों पियूँ , ललक बढती ही जावे .....
कहा करूँ बस में नहीं मेरे , मन के पीछे जोगन बन सी फिरूँ ......
..........प्रार्थना .....