Wednesday, 11 May 2011

कान्हा ने ओढा पिला-पीताम्बर ,मैंने है नारंगी
     कभी तो मिलने की होगी आस पूरी .....

   कान्हा तो हैं सागर ,में तो हूँ गागर
         कैसे समाऊँ तुझे, तेरा स्नेह है अपार...

   जरा सा तुझे पाया ,मन तो इठलाया 
        पग-पग धीर न धरूँ, झलकता ही जाऊँ... 

    तुझे नजरों में भरूँ ,स्वयं को सबसे चुराऊँ
        मेरा ये कैसा दीवानापन है, तुझ में पाया जो अपनापन है....

   न सूझ रहा मुझे, किधर जा रही हूँ
       मालूम है मुझे, में सिर्फ तुझे पाती जा रही हूँ ....
        
तुझे पाया में इस तरह से कि.....

    मेरा मोल कहाँ रहा, मैं तो अनमोल हुई .....
    मेरा सुख  कहाँ रहा, मैं तो आनन्द  हुई....
     मेरा दुःख  कहाँ रहा ,मैं तो शांत  हुई....
     मेरा अँधेरा कहाँ रहा,मैं तो उजाला हुई....
       मेरा अस्तित्व कहाँ रहा, मैं तो भगत हुई......
     
मैं डूबी रहूँ प्रेम-सागर में और प्रेम-मग्न रहूँ भक्ति-भाव में...

     भक्ति की परत-दर-परत चढती रहे,
           प्रेम की प्रबलता मुझमें बढती रहे ....

    शान्त ह्रदय में  मैं सदा धीर धरूँ ,
          मौन के आनंद में सदा विचरूं ...
   
   

Sunday, 27 February 2011

बसंत खिला मेरे जीवन में,
            पीली-पीली हुई तेरी चाह में.....

 जित देखूँ तुझे पाऊँ 
           और खिल-खिल जाऊँ
मन पपीहा  -सा बन गाये
             रोम-रोम में तुझे पाऊँ .......

Friday, 14 January 2011

हे!माँ
तुम व्योम विशाल,
पर तुम सदा मेरे मन के धरातल पर .....
तुम श्वेत गंगा ,
पर तुम सदा मेरे तन में लहु बन कर .....

Saturday, 17 July 2010

मेरा बचपन .....

मुझे याद
नहीं अपना बचपन
कुछ   पलों  के सिवा,
कुछ -भूला
कुछ -बिसरा
कुछ -चुप सा
था यह मन मेरा .....
कुछ  पलों  में खो भी जाऊँ
तो याद आता है
कि मैं चुप हूँ
और समय कि धारा बह रही है....
और हाँ !
माँ की  मेरे प्रति और मेरी उनके प्रति कुछ भावनाएँ,
मुझे डर कि वह कहीं गुम ना हो जायें .......
मैंने सदा अपने आपको अपने आप में ,
सिमटा पाया कुछ पलों के साथ ,
 जैसे सिमटे पड़े
कुछ  ओस  के मोती  ,
किसी वृक्ष की   डाली पर ....
मैं ,
ऐसी धूल
जो सदा ही फटकारी जाती है....
जो सदा ही पोंछ दी जाती है....
मेरा शिकवा
तुझसे मिलने के बाद ,
मेरी पहचान बन बैठा
और
मेरा मन
कुछ शाँत हो गया ....
हर फटकार पर मैं ,
छनती कहती चली गई और
मैंने अपने संग जीना सीखा...
यह मेरे जीवन की सीख ,अनुभूति
और तेरे प्रति मेरे अनुराग भी है....
मैं इस गहराई में और भी जाना चाहूँगी....
मैं,
मन के वीराने के
 मन्दिर की धूल बनूँगी
जो सदा तेरे चरणों पर सदा बिछी रहे.....