Wednesday, 28 November 2012

मनन 
"दुःख"...तभी तक है , जब तक हम इसे या इससे होने वाली पीड़ा का स्वागत करेंगे ... 
और भूल जाते हैं कि जीवन इसके बिना और आगे भी है ..
जो कि हमारी सोच और कर्म में निहित है ...
उसी का होना हमारे जीवन और होने का परिचायक है...न कि उसे सहजना या उसके साथ जीना या चलना...
.क्यों कि तब वह आपके जीवन में गड्ढे खोदेगा...दिखेगा....या एहसास करायेगा...
इसलिए ऐसी स्थिति में उसका रास्ता बंद कर अपनी गति तेज कर लेनी चाहिए ....
और उसे बहुत पीछे छोड़ देना चाहिए ...जिससे वह आपकी बराबरी ही नहीं कर पाए ...
उसे उलटा कुंठित होने दो और आप अपनी मंजिल पा लो ....उचाईयों कि......
.....प्रार्थना....
मनन
"ईच्छाशक्ति "....मनुष्य को चलायमान रखती है अर्थार्त उसके जीवन को गति देती है और नवसंचार भी करती रहती है | यह बोध भी , स्वयं के होने का कराती है कि आप हो...यह भी तो जानना जरुरी या इसका एहसास कि आप विषय वास्तु ना हो कर एक ईश्वरीय स्वरूप हो, जिस का संचार ईश्वरीय माध्यम से होता है |अपनी शक्ति को ईश्वरीय , इच्छाशक्ति में बदल कर , 
उसको कर्म , सोच और विचार में बनाकर गति शीलता देना तभी उसका वास्तविक स्वरूप , हम में प्रकट होगा......कृष्ण कहतें हैं ... कि मैं सभी प्राणी - जीव जंतु में वास करता हूँ .....तो क्यों न खुद को और अपनी इच्छाशक्ति को सशक्त माध्यम बना कर ईश्वरीय औरा [aura] में , स्वयं को समाहित क्या जाये.....
.......प्रार्थना......
मनन 
"विश्वास "....यह मुझे , एक सतत चलने वाली प्रक्रिया लगती है और वह भी जीवन परयन्त्र......यह एक ऐसी नैया है जिसमें बैठ कर ही उसके होने ना होने पता लगता है.....वरन नहीं....कभी हम हार जातें हैं ...जीतते -जीतते और कभी जीत जातें हैं....हारते-हारते....यह भी एक मन:स्थिति जैसी है....बदलती ...रूकती.........खोती...पाती..और बहती है....और हाँ!!! धोखा भी है....जहाँ विश्वास नाम मात्र को है....नींव अच्छी
 ना होने पर....क्यों कि स्वाभाविक है....नींव अच्छी ना होने पर ...ढह जाएगी ही....स्वार्थ निकल जाने पर...पल भर नहीं टिकती ...कारागार नहीं है......
सबसे पहले इसका आधार मजबूत रकना होगा , जिसमें स्वार्थ न हो कर ..समय पर डटे रहना ....सबल सहारा बनने...वक्त पर काम आना ....अपनी मौजूदगी की उपस्थिति से मजबूती देना....आदि-आदि....तभी इसका अंकुर फूटता है....और वृक्ष बनता है.....फल अवश्य ही मीठा होगा....
विश्वास के बल पर ही कबीर ... सूर ...मीरा....आदि ने सद्गति पाई और भगवत प्राप्ति पाई.....इसलिए आशंका अंश मात्र भी नहीं है...कि वो घट-घट वासी है....यह हम इंसानों में भी बन और मिल सकती है....

घट-घट वासी , घट-घट- में बिराजे
नैया मेरी विश्वास पे तेरे चले
माँझी बन और पतवार सम्हाल
चाहे तो उतार या चाहे लगा पार
तू चाहे या ना चाहे कान्हा
मैं तो बिराजी तेरी ही धुन रमाये......
.......प्रार्थना.......
ना बिखरो तुम इस जीवन की पगडंडीयों पर 
ना चुरा सकेगा कोई तुम्हारे मन की सोच -विचार 
ना मिटा सकेगा तुम्हारे होने का वजूद - अस्तित्व 
ना हिला सकेगा तुम्हारे चित की शान्ति - चैन 
बस तू चल -चली ...चल ....डगर पर 
जीवन की सार्थकता लिए ....अपने हृदय में .....
......प्रार्थना ......

Monday, 19 November 2012

साहिलों को देख मुकाम नहीं मिला करते 
पतवार चलाते -चलाते ही ये पल हैं गुजरते 
किनारों पर बैठ लहरों को गिनने से नहीं 
लहरों को अपने में समाकर ही जीना 
क्यों कि ...जीवन रूपी किनारे नहीं रहते एक से सदा....
........प्रार्थना ........

Sunday, 21 October 2012

यूँ तो मैंने खुद का जीवन जिया ही कब ???
पहले बीस संस्कारों वाली बेटी बनने में गुजारे
फिर अच्छी बहू बनने की चाह में जुट गई ,
बीच-बीच में पत्नी होने को भी खोजती रही 
हाँ अब "माँ " कि बारी में पल -पल के हिसाब से जीती चली गई
हो गए हैं वो आत्म -निर्भर ....
आदत से हूँ मजबूर , ढूंढ रही फिर से कोई 
पलों को बिताने का बहाना...............

Friday, 14 September 2012

पल-पल तुझमें स्वयं को 
पिघला लेना 
मुझे भाने लगा है....

तेरे आगे यूँ ही स्वयं को 
बिखरा देना
मुझमें सामने लगा है.....

तेरा माध्यम बन स्वयं को
समझ जाना
मुझे तृप्त करने लगा है....

तेरी निश्छलता बन स्वयं को
संतुष्ट करना
मुझे मुक्त करने लगा है......