Tuesday, 11 October 2011

"जननी" को सदा ही मैंने एक बहती धरा माना है, पर आज एक अलग सा रूप देख पा रही हूँ
ना जाने क्यों मन में एक विचार आया क्या वह एक भरा-पूरा कुआँ है ?
जन्म सी उसे बांधते जाते हैं रिश्तों में
अर्थार्त खोदते,गहराते और गोला रूपी दायरे में सिमित करते जाते हैं और
वह गहरा जाती है...जब-तक उसमें स्वयं की अनेक धारायें न निकलती
एक दिन वह बन जाती है भावनाओं से ओत-प्रोत या लबालब कुआँ
जिसका मन आये जब उलीच लो और तृप्त हो लो...
सभी रिश्तों को तृप्त करते हुए वह स्वयं हो जाती है खंगर ...
कभी हर आवाज को लोटाती.आज वह अकेली पड़ी है...रीती पड़ी है....
क्या नियति ने उसे सिर्फ तृप्त करने के लिए रचा है ??
उसके अँधेरे मन में झाँकना तो दूर ,कोई निकट नहीं आना चाहता....
इस रीते कुएँ के पास .......

Sunday, 9 October 2011

तेरे जैसा प्रेम और कहाँ ..?

तेरे नयनों में जैसा प्रेम
अपने लिए कहाँ पाती हूँ,
मुझे हर नयन रीता ही लगता है....

तुझ से एकाकार होने में
मैं स्वयं खो जाती हूँ,
मुझे हर मिलन झूठा ही लगता है

तेरी स्थिरता के आगे
मैं तुझे पा जाती हूँ,
मुझे हर पल ही शून्य लगता है.....

तेरी शक्ति-संचार के आगे
मैं अपने में तेरा एहसास पाती हूँ ,
मुझे तब अपना जीवन ही "एक-भ्रम" लगता है....

Sunday, 28 August 2011

किसी से मिल के हम ना मिले
जब तक हम तुम से ना मिले.....

यूँ तो मिले हर बार तुमसे
खो कर अपने आप को तुमसे....
.
ललक बढती ही जा रही है
मृग-तृष्णा भटकाती ही जा रही है....

दुनिया करे सवाल,कहाँ हो इस हाल
कैसे कहूँ ?मौन के आनंद में हूँ फिलहाल....

Wednesday, 17 August 2011

मैं,
हूँ राह का पत्थर
हर राहगीर ठोकर मार
बढता मंजिल ओर....

मैं,
लुढकती-ठुलकती
इधर-उधर भटकती
न जाने किस ओर....

मैं,
टूटती-फूटती
झर-झर हुई
जा पहुँची कान्हा ओर....

मैं,
समझ ना पाई
क्यों लुढकाई गई
क्या ऐसे ही आते हैं तेरी ओर...

Tuesday, 16 August 2011

मैं

तुझसे और क्या माँगू  ?

जब मेरे नैनों का आँचल ही भीग जाता है...

तुझसे और क्या चाहूँ?

जब मेरी चाहत का प्याला ही छलक जाता है.....

तुझसे और क्या सुनूँ ?

जब मेरे ध्यान में तेरी, मौन की गूंजें भर जाती हैं....

तुझसे और क्या पाऊँ ?

जब मुझे स्वयं में ही खो जाने को जी चाहता है....

तुझसे और क्या अरज करूँ?

जब मेरा हृदय ही तेरे प्रेम से भर जाता है....
मेरे प्रभु!!!!
बंधन स्वीकार करो मेरा

जो रिश्तों से मुक्त हो,परे हो ....
जिसमें आत्मीयता की डोर हो,
जिसमें निष्कपटता के फूल खिले हों,
जिन्हें स्नेह-नीर से सींचा हों,
जिसमें मिलन की आस हो,
जिसको देख- गर्व समर्पण का हो.....

ऐसे बंधन से मैं तुम्हें बाँधना चाहूँ
यही है मेरा "रक्षाबंधन " है तुम्हें.....
मैं भी जी लेती हूँ ......

सपनो जैसे विशाल व्योम को देख,

धैर्य धर लेती हूँ धरा को देख,

अश्रु बहा लेतीं हूँ मेघ बन कर,

आवेगों को सामा लेती हूँ किनारे बन कर ....

यह सभी तुम्ही से तो सीखा है,

तुम्हारे पद-चिन्हों पर चल उन्हें गहरा देती हूँ......