"जननी" को सदा ही मैंने एक बहती धरा माना है, पर आज एक अलग सा रूप देख पा रही हूँ
ना जाने क्यों मन में एक विचार आया क्या वह एक भरा-पूरा कुआँ है ?
जन्म सी उसे बांधते जाते हैं रिश्तों में
अर्थार्त खोदते,गहराते और गोला रूपी दायरे में सिमित करते जाते हैं और
वह गहरा जाती है...जब-तक उसमें स्वयं की अनेक धारायें न निकलती
एक दिन वह बन जाती है भावनाओं से ओत-प्रोत या लबालब कुआँ
जिसका मन आये जब उलीच लो और तृप्त हो लो...
सभी रिश्तों को तृप्त करते हुए वह स्वयं हो जाती है खंगर ...
कभी हर आवाज को लोटाती.आज वह अकेली पड़ी है...रीती पड़ी है....
क्या नियति ने उसे सिर्फ तृप्त करने के लिए रचा है ??
उसके अँधेरे मन में झाँकना तो दूर ,कोई निकट नहीं आना चाहता....
इस रीते कुएँ के पास .......
हृदय की बंजर जमीं पर,जब भक्ति की स्नेह वर्षा होती है तो कुछ अंकुर स्वतः ही फूट पड़ते हैं.....उन पल्लवों पर कुछ ओस की बूँदें भावना बन कर उभर जातीं हैं.....बस ये वही आवेग हैं......
Tuesday, 11 October 2011
Sunday, 9 October 2011
तेरे जैसा प्रेम और कहाँ ..?
तेरे नयनों में जैसा प्रेम
अपने लिए कहाँ पाती हूँ,
मुझे हर नयन रीता ही लगता है....
तुझ से एकाकार होने में
मैं स्वयं खो जाती हूँ,
मुझे हर मिलन झूठा ही लगता है
तेरी स्थिरता के आगे
मैं तुझे पा जाती हूँ,
मुझे हर पल ही शून्य लगता है.....
तेरी शक्ति-संचार के आगे
मैं अपने में तेरा एहसास पाती हूँ ,
मुझे तब अपना जीवन ही "एक-भ्रम" लगता है....
अपने लिए कहाँ पाती हूँ,
मुझे हर नयन रीता ही लगता है....
तुझ से एकाकार होने में
मैं स्वयं खो जाती हूँ,
मुझे हर मिलन झूठा ही लगता है
तेरी स्थिरता के आगे
मैं तुझे पा जाती हूँ,
मुझे हर पल ही शून्य लगता है.....
तेरी शक्ति-संचार के आगे
मैं अपने में तेरा एहसास पाती हूँ ,
मुझे तब अपना जीवन ही "एक-भ्रम" लगता है....
Sunday, 28 August 2011
Wednesday, 17 August 2011
Tuesday, 16 August 2011
मैं
तुझसे और क्या माँगू ?
जब मेरे नैनों का आँचल ही भीग जाता है...
तुझसे और क्या चाहूँ?
जब मेरी चाहत का प्याला ही छलक जाता है.....
तुझसे और क्या सुनूँ ?
जब मेरे ध्यान में तेरी, मौन की गूंजें भर जाती हैं....
तुझसे और क्या पाऊँ ?
जब मुझे स्वयं में ही खो जाने को जी चाहता है....
तुझसे और क्या अरज करूँ?
जब मेरा हृदय ही तेरे प्रेम से भर जाता है....
तुझसे और क्या माँगू ?
जब मेरे नैनों का आँचल ही भीग जाता है...
तुझसे और क्या चाहूँ?
जब मेरी चाहत का प्याला ही छलक जाता है.....
तुझसे और क्या सुनूँ ?
जब मेरे ध्यान में तेरी, मौन की गूंजें भर जाती हैं....
तुझसे और क्या पाऊँ ?
जब मुझे स्वयं में ही खो जाने को जी चाहता है....
तुझसे और क्या अरज करूँ?
जब मेरा हृदय ही तेरे प्रेम से भर जाता है....
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