मेरे प्रभु!!!!
बंधन स्वीकार करो मेरा
जो रिश्तों से मुक्त हो,परे हो ....
जिसमें आत्मीयता की डोर हो,
जिसमें निष्कपटता के फूल खिले हों,
जिन्हें स्नेह-नीर से सींचा हों,
जिसमें मिलन की आस हो,
जिसको देख- गर्व समर्पण का हो.....
ऐसे बंधन से मैं तुम्हें बाँधना चाहूँ
यही है मेरा "रक्षाबंधन " है तुम्हें.....
हृदय की बंजर जमीं पर,जब भक्ति की स्नेह वर्षा होती है तो कुछ अंकुर स्वतः ही फूट पड़ते हैं.....उन पल्लवों पर कुछ ओस की बूँदें भावना बन कर उभर जातीं हैं.....बस ये वही आवेग हैं......
Tuesday, 16 August 2011
Monday, 23 May 2011
तेरा स्नेह पा मैं धन्य हुई,
जो तूने हृदय में प्रेम भर दिया .....
इस रीते घट में आनन्द भर दिया,
जो हर पल छ्लके मेरे नयनों से
अपनी प्रेम-बोछार से भिगो दिया....
तन-मन तृप्त हुए जैसे,अम्बर की फुहार से धरा
सभी को अपने हृदय में पाया,
देखा -तू हर हृदय में समाया....
यही तो है तेरी "प्रेम की मंजुषा "
न निकलूँ कभी यही है "मेरी -आशा ".....
जो तूने हृदय में प्रेम भर दिया .....
इस रीते घट में आनन्द भर दिया,
जो हर पल छ्लके मेरे नयनों से
अपनी प्रेम-बोछार से भिगो दिया....
तन-मन तृप्त हुए जैसे,अम्बर की फुहार से धरा
सभी को अपने हृदय में पाया,
देखा -तू हर हृदय में समाया....
यही तो है तेरी "प्रेम की मंजुषा "
न निकलूँ कभी यही है "मेरी -आशा ".....
Wednesday, 11 May 2011
कान्हा ने ओढा पिला-पीताम्बर ,मैंने है नारंगी
कभी तो मिलने की होगी आस पूरी .....
कान्हा तो हैं सागर ,में तो हूँ गागर
कैसे समाऊँ तुझे, तेरा स्नेह है अपार...
जरा सा तुझे पाया ,मन तो इठलाया
पग-पग धीर न धरूँ, झलकता ही जाऊँ...
तुझे नजरों में भरूँ ,स्वयं को सबसे चुराऊँ
मेरा ये कैसा दीवानापन है, तुझ में पाया जो अपनापन है....
न सूझ रहा मुझे, किधर जा रही हूँ
मालूम है मुझे, में सिर्फ तुझे पाती जा रही हूँ ....
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