Thursday, 2 May 2013

मनन ......
" अध्यात्म "....एक खोज !!!! ....कर्णप्रिय - विषय ..आजकल .....
मुझसे किसी ने ऐसी किताब के बारे में पूछा जो  इस ओर , उसे ले जा सके या बता ही सके ....तब मेरे मन यह प्रश्न आया क्या कोई किताब यह सिखा  सकता है .... ये एक मानव की इंसानियत की स्वयं के द्वारा खोज है ....यह तो खुद की भी खोज हो सकती है  ......या ये आंतरिक तौर पर समझने का विषय है ????...जिसे हम स्वतः ही जन्म ....पनपा ....अंकुरित ...रोपण या इसका खुद से ही अपने जीवन में अनावरण हटा सकते  हैं .....यह विषय मुझे भी और मेरे मन में भी कई बार  " कौंधता " रहता है ...चलता है  ......या हम इसे मानसिक तौर  पर किया गया गहन अध्यन , सोच , समझ, कर्म और "मैं " से ऊपर उठ कर ???? की सोच ....जो समय , अनुभव और उम्र से जीवन में आने वाली स्थिति  के अनुसार मान लें ......अपितु इसे ईश्वरीय कृपा मान लें ......
मुझे  तो यह एक प्रक्रिया लगती है, जितना डूबेंगे उतना , उतना उबरेंगे .....हाँ अच्छी किताबें भी सहायक हो सकतीं हैं .....मैंने जितना अपने स्तर से समझा है ..... सुख , शान्ति , समन्वय , सामंजस्य ,सोच , स्थिरता , समभाव , सहभागिता ....आदि ...आदि ...की बढ़ोतरी का पथ है .....
[बस यूँ ही एक विचार ...]
.........प्रार्थना ..........

Thursday, 18 April 2013

मनन .....
" मैं "....आखिर क्या है ये " मैं  ".....का परिचय क्या है ?? जो हमने अपने अहं को अपने अंदर बो दिया या इकठ्ठा कर हमारी पहचान बन बैठा है .....शायद इस में बंध कर हम  अपनी सोच और संकुचित दायरे का परिचय देते हैं ... जब हम इस मैं से अपने को बाँध लेते  है तो फिर  इसी के हो कर रह जाते  है .....लेकिन अगर सोंचें कि ....  "सोच " की ऊँची उड़ान के आगे , कितना सूक्ष्म है ...... 
" मन " की गहराई के आगे कितना हल्का है ....." मौन " की परिभाषा के आगे , कितना निशब्द: है ...... "शहीदों "की कुर्बानी के आगे 
कितना स्वार्थी है ......आदि ...आदि .....तो फिर क्या फायदा इस  "मैं "...का…. अपना परिचय बनाना चाहेंगे इसे ???
 { बस यूँ ही एक विचार .....}
........प्रार्थना .

Wednesday, 17 April 2013

कभी जो हम अपने नहीं हुए और अपने आप के ही हो जाना ....
भाने लगा है अब .....
साहिलों की खोज में रहे और मोंजों में घुलना -मिलना ....
आने लगा है अब ....
मंजिल की तलाश में रहते और राह में खोते रहना ही ....
भाने लगा है अब ......
ये जो मन चंचला बन थिरकता और बिन मचले ही स्वयं को .....
थामे रहता है अब .......
......प्रार्थना .......

मेरे सुखसागर के
नीर - नभ - वसुंधरा - पवन - अग्नि ,
मुझ में समाते हैं .....
और समय-समय पर
अपना प्रभाव मुझ में दिखला कर
अक्सर शाँत हो जाते हैं
और उनके बचे हुए अवशेषों को
सहज लेतीं हूँ अपने आँचल में .....
जो मुझे सिखा जाते
जीवन को बेहतर बनाने की कला ......
.....प्रार्थना .........

Thursday, 11 April 2013

मनन ....
" शक्ति "......रूप में ...." माँ " का ही परिचायक शब्द है ......इसका अर्थ सिर्फ शक्तिरुपेण , निद्रारूपेण , बुद्धिरूपेण , शांतरूपेण ...नहीं वरन समस्त ऊर्जाओं का समावेश है , जिससे हम और सृष्टि बंधे हुए हैं .....जिस तरह शक्ति बिन कुछ भी संभव नहीं और बिना संचार हुए किसी की गति नहीं ....यह समस्त प्राणियों में जिजीवीशिका का साधन है , जिसमें कर्म की नित्य ही आहुतियाँ देनी पड़तीं हैं ....
हे जीवनदायनी माँ !!!
बस यूँ ही हम में , अपनी ऊर्जा के स्त्रोत के रूप में बहती रहना .....
[बस यूँ ही एक विचार ...]
.........प्रार्थना ......

Saturday, 6 April 2013

चलो ..सोच का .......
एक मुक्कमल जहान  बसायें 
शाँत तरुवर सा हृदय बनायें और कमल बन  खिल जाएँ ....
उसमें शशि के प्रतिबिम्ब जैसा ठहराव लायें और चकोरी जैसी एकाग्रिता दिखाएँ ..... 
मन - हंस बन यह जीवन जियें और ज्योत्स्ना बन बिखरें चहुँ ओर .....
.......प्रार्थना ..........
जब मौन ना समझा जाये तो , कुछ कहना व्यर्थ है 
जब आँसू ना पौंछे जायें तो , अभिव्यक्त करना व्यर्थ है 
अपने आप को ही समझाना , बचाना और सुधारना  कारगर उपाय है .....
......प्रार्थना .........