Sunday, 27 February 2011

बसंत खिला मेरे जीवन में,
            पीली-पीली हुई तेरी चाह में.....

 जित देखूँ तुझे पाऊँ 
           और खिल-खिल जाऊँ
मन पपीहा  -सा बन गाये
             रोम-रोम में तुझे पाऊँ .......

Friday, 14 January 2011

हे!माँ
तुम व्योम विशाल,
पर तुम सदा मेरे मन के धरातल पर .....
तुम श्वेत गंगा ,
पर तुम सदा मेरे तन में लहु बन कर .....

Saturday, 17 July 2010

मेरा बचपन .....

मुझे याद
नहीं अपना बचपन
कुछ   पलों  के सिवा,
कुछ -भूला
कुछ -बिसरा
कुछ -चुप सा
था यह मन मेरा .....
कुछ  पलों  में खो भी जाऊँ
तो याद आता है
कि मैं चुप हूँ
और समय कि धारा बह रही है....
और हाँ !
माँ की  मेरे प्रति और मेरी उनके प्रति कुछ भावनाएँ,
मुझे डर कि वह कहीं गुम ना हो जायें .......
मैंने सदा अपने आपको अपने आप में ,
सिमटा पाया कुछ पलों के साथ ,
 जैसे सिमटे पड़े
कुछ  ओस  के मोती  ,
किसी वृक्ष की   डाली पर ....
मैं ,
ऐसी धूल
जो सदा ही फटकारी जाती है....
जो सदा ही पोंछ दी जाती है....
मेरा शिकवा
तुझसे मिलने के बाद ,
मेरी पहचान बन बैठा
और
मेरा मन
कुछ शाँत हो गया ....
हर फटकार पर मैं ,
छनती कहती चली गई और
मैंने अपने संग जीना सीखा...
यह मेरे जीवन की सीख ,अनुभूति
और तेरे प्रति मेरे अनुराग भी है....
मैं इस गहराई में और भी जाना चाहूँगी....
मैं,
मन के वीराने के
 मन्दिर की धूल बनूँगी
जो सदा तेरे चरणों पर सदा बिछी रहे.....

Wednesday, 14 July 2010

मेरी पहचान क्या है ?........

मेरी बुराईयों पर मेरी अच्छाइयों की जीत ही
 मेरी पहचान है.....
कभी-कभी ,मेरी कोमल भावनाएँ पर  गहरी
चोट से आहत हो जाती हूँ .......
पर तेरे साथ और होने के अहसास से,
मैं फिर से जी  उठती  हूँ,जैसे मुरझाये  हुए पौधे में,
कोई फिर से जल से भर दे ......