बसंत खिला मेरे जीवन में,
पीली-पीली हुई तेरी चाह में.....
जित देखूँ तुझे पाऊँ
और खिल-खिल जाऊँ
मन पपीहा -सा बन गाये
रोम-रोम में तुझे पाऊँ .......
हृदय की बंजर जमीं पर,जब भक्ति की स्नेह वर्षा होती है तो कुछ अंकुर स्वतः ही फूट पड़ते हैं.....उन पल्लवों पर कुछ ओस की बूँदें भावना बन कर उभर जातीं हैं.....बस ये वही आवेग हैं......