Saturday, 7 July 2012

ओ .....कारे.... बदरवा ......
काहे को... पीहर की याद दिलावे
वो बचपन में अटारी पे चढ़ 
माँ को पुकारना और फिर डांट खाना......
गैस खत्म होने पर ,
चूल्हे की चाय-ढूध पीते-पीते पल्लू को मुठ्ठी में पकड़ते जाना...और मुँह बनाना 
और माँ को सिगड़ी पर खाना बनाते हुए देखना
शिव जी का अवषेक, श्रृंगार और रुद्र्काष्ट्म..आरती.....
पता नहीं तू मुझे मेरी कमजोरी गिना रहा कि....मजबूत बना रहा.....
ओ...कारे....बदरवा .......

Wednesday, 27 June 2012


छूटा क्या,
माँ का आंगन
छूटा है, धरा से नेह....
सिमटी हूँ गागर में
न भर पाऊँ,इसे जग-सागर से.......
तेरी छुअन ....गर्माहट ....महक,
क्यों भटकाती है मुझे
इस विरह-तपोवन में.....
प्यासी है मन की धरा,
रीता है सोच का गगन ....
कलम लिए लिख रही हूं तुझे
जिसमें भरी थी तूने कभी , अपने ममता की स्याही.....

Thursday, 10 May 2012

मुझे क्यों हराते हो, मैंने कब जीतना चाहा... और मैं तो सिर्फ चलना ही चाहती थी, तुम्हारे साथ-साथ..... और तुम पाने की बात करते हो, तो पहले मुझे खोज तो लो.... और तुम चेहरा पढ़ने का दावा करते हो, तो पहले मुझे समझो तो..... और हाँ!!!! मुझे ढूँढो मत.....अपने में ही कहीं ...गुम ही रहने.....दो.....

Wednesday, 2 May 2012

तेरी तो हर बात ही निराली थी.... तूने जो झुकाई , मेरे हर कदम पर अपनी बाहों की डाली थी..... तेरी तो हर बात ही अनकही थी.... तूने जो पिलाई , मेरी नासमझी पर अपनी समझ की प्याली थी..... तेरी तो हर बात में ही दूर-दृष्टि थी.... तूने जो बोई, मेरे अंतर-मन पर अपनी सरल-सहज और सहजता की छवि थी.... हे माँ! मेरी तो हर बात ही सदियों पुरानी थी.... तूने जो सुनायी , मैंने भी वो ही निभायी अपनी-तेरी रीत पुरानी....

Thursday, 29 March 2012

दोहरा जीवन जीतीं हूँ....
उनके साथ
एक जो मुझे सही समझते हैं...और दूसरे वो जो नहीं समझते....
मैं स्वयं क्या हूँ ?
आईने के सामने खड़े हो कर पूछा....
वह सच ही बोला....
क्या तू अपने से खुश है ?
--कुछ लोग तो हैं मुझ से......
तो बस आज से तू उनके साथ ही जी.....ले "अपना जीवन".....

Monday, 19 March 2012

"यात्रा"
मैं यात्री हूँ ,
अभी सफ़र पर हूँ.....
हर सुबह नया सवेरा,
हर साँझ नई आस.....
हर पल से जूझती हुई,
हर पल को खोजती हुई....
कशमकश के द्व्न्द को सोचती
फिर एक,मन की उड़ान भरती....
आ जाती हूँ,जीवन के धरातल पर,
मन के बोझ को हल्का कर....
हर नया यात्री कुछ सिखा जाता,
जो छूता वो मन में रह जाता.....
हर ठहराव तसल्ली दे जाता
और आगे बढने को कह जाता....
हाँ!!! मैं चलायमान हूँ
निरंतर चलना ही गति है.....
क्योंकि कि मैं "यात्री "हूँ
अभी यात्रा पूरी करनी है......

Sunday, 18 March 2012

माँ!!!
मैं अभी तक दो नावों में सवार थी.....
पर तेरे जाने के बाद
यह द्व्न्द भी अनछुआ न रहा....और समाप्त हो गया....
अब मन भी एक तरफा हुआ
लगता यहीं ... मेरे दायरा है......

तेरे आँचल तले
जैसी छांव तो नहीं
पर,आसरा-घरौंदा अब यहीं है......

तेरे नर्म कर की
गर्माहट तो नहीं
पर,सहारा-साथ अब यहीं है.......

तेरे लबों जैसी मीठी
मुस्कराहट तो नहीं
पर, हँसना -मुस्कुराना अब यहीं है.......