हृदय की बंजर जमीं पर,जब भक्ति की स्नेह वर्षा होती है तो कुछ अंकुर स्वतः ही फूट पड़ते हैं.....उन पल्लवों पर कुछ ओस की बूँदें भावना बन कर उभर जातीं हैं.....बस ये वही आवेग हैं......
Wednesday, 2 May 2012
तेरी तो हर बात
ही निराली थी....
तूने जो झुकाई ,
मेरे हर कदम पर
अपनी बाहों की डाली थी.....
तेरी तो हर बात
ही अनकही थी....
तूने जो पिलाई ,
मेरी नासमझी पर
अपनी समझ की प्याली थी.....
तेरी तो हर बात
में ही दूर-दृष्टि थी....
तूने जो बोई,
मेरे अंतर-मन पर
अपनी सरल-सहज और सहजता की छवि थी....
हे माँ!
मेरी तो हर बात
ही सदियों पुरानी थी....
तूने जो सुनायी ,
मैंने भी वो ही निभायी
अपनी-तेरी रीत पुरानी....
Thursday, 29 March 2012
Monday, 19 March 2012
"यात्रा"
मैं यात्री हूँ ,
अभी सफ़र पर हूँ.....
हर सुबह नया सवेरा,
हर साँझ नई आस.....
हर पल से जूझती हुई,
हर पल को खोजती हुई....
कशमकश के द्व्न्द को सोचती
फिर एक,मन की उड़ान भरती....
आ जाती हूँ,जीवन के धरातल पर,
मन के बोझ को हल्का कर....
हर नया यात्री कुछ सिखा जाता,
जो छूता वो मन में रह जाता.....
हर ठहराव तसल्ली दे जाता
और आगे बढने को कह जाता....
हाँ!!! मैं चलायमान हूँ
निरंतर चलना ही गति है.....
क्योंकि कि मैं "यात्री "हूँ
अभी यात्रा पूरी करनी है......
मैं यात्री हूँ ,
अभी सफ़र पर हूँ.....
हर सुबह नया सवेरा,
हर साँझ नई आस.....
हर पल से जूझती हुई,
हर पल को खोजती हुई....
कशमकश के द्व्न्द को सोचती
फिर एक,मन की उड़ान भरती....
आ जाती हूँ,जीवन के धरातल पर,
मन के बोझ को हल्का कर....
हर नया यात्री कुछ सिखा जाता,
जो छूता वो मन में रह जाता.....
हर ठहराव तसल्ली दे जाता
और आगे बढने को कह जाता....
हाँ!!! मैं चलायमान हूँ
निरंतर चलना ही गति है.....
क्योंकि कि मैं "यात्री "हूँ
अभी यात्रा पूरी करनी है......
Sunday, 18 March 2012
माँ!!!
मैं अभी तक दो नावों में सवार थी.....
पर तेरे जाने के बाद
यह द्व्न्द भी अनछुआ न रहा....और समाप्त हो गया....
अब मन भी एक तरफा हुआ
लगता यहीं ... मेरे दायरा है......
तेरे आँचल तले
जैसी छांव तो नहीं
पर,आसरा-घरौंदा अब यहीं है......
तेरे नर्म कर की
गर्माहट तो नहीं
पर,सहारा-साथ अब यहीं है.......
तेरे लबों जैसी मीठी
मुस्कराहट तो नहीं
पर, हँसना -मुस्कुराना अब यहीं है.......
मैं अभी तक दो नावों में सवार थी.....
पर तेरे जाने के बाद
यह द्व्न्द भी अनछुआ न रहा....और समाप्त हो गया....
अब मन भी एक तरफा हुआ
लगता यहीं ... मेरे दायरा है......
तेरे आँचल तले
जैसी छांव तो नहीं
पर,आसरा-घरौंदा अब यहीं है......
तेरे नर्म कर की
गर्माहट तो नहीं
पर,सहारा-साथ अब यहीं है.......
तेरे लबों जैसी मीठी
मुस्कराहट तो नहीं
पर, हँसना -मुस्कुराना अब यहीं है.......
Saturday, 17 March 2012
माँ!!
जब तुझे याद करूँ
तो समय रुका सा पाऊँ
लगता है ही नहीं कि तुम नहीं हो....
मुझे स्वयं को समझाना पड़ता है
कि दूर जा चुका,तुम्हारा वजूद है
पता नहीं ये मेरे जीवन का कौन सा पड़ाव है.....
एक खालीपन का एहसास है
यादों से भरी झुरमुट की साँझ है
"मेरी रानी बेटी" दूर से कोई बुलाये,बस आस है .....
अश्रु बहा हल्की हो उठती हूँ
तेरी हँसी को याद क्र के थोडा हँस भी लेती हूँ...
जब तुझे याद करूँ
तो समय रुका सा पाऊँ
लगता है ही नहीं कि तुम नहीं हो....
मुझे स्वयं को समझाना पड़ता है
कि दूर जा चुका,तुम्हारा वजूद है
पता नहीं ये मेरे जीवन का कौन सा पड़ाव है.....
एक खालीपन का एहसास है
यादों से भरी झुरमुट की साँझ है
"मेरी रानी बेटी" दूर से कोई बुलाये,बस आस है .....
अश्रु बहा हल्की हो उठती हूँ
तेरी हँसी को याद क्र के थोडा हँस भी लेती हूँ...
Wednesday, 14 March 2012
Sunday, 11 March 2012
"मन के मंजीरे"
आज मैं स्त्री को.....
पौधे के रूप में देख रही हूँ
धूप [दुःख] में खुम्हला जाता है....
छाँव [साथ ] में शाँत रहता है.....
गुड़ाई [वजूद] करने से गहरा जाता है....
सींचने [एहसास] से हरया जाता है....
निहारने [बिना छेड़े] से सकून देता है....
खाद [प्रेम] डालने पर देर तक चलता है ............बस यूँ ...ही......एक ख्याल......
आज मैं स्त्री को.....
पौधे के रूप में देख रही हूँ
धूप [दुःख] में खुम्हला जाता है....
छाँव [साथ ] में शाँत रहता है.....
गुड़ाई [वजूद] करने से गहरा जाता है....
सींचने [एहसास] से हरया जाता है....
निहारने [बिना छेड़े] से सकून देता है....
खाद [प्रेम] डालने पर देर तक चलता है ............बस यूँ ...ही......एक ख्याल......
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