हृदय की बंजर जमीं पर,जब भक्ति की स्नेह वर्षा होती है तो कुछ अंकुर स्वतः ही फूट पड़ते हैं.....उन पल्लवों पर कुछ ओस की बूँदें भावना बन कर उभर जातीं हैं.....बस ये वही आवेग हैं......
Saturday, 18 February 2012
Tuesday, 7 February 2012
Sunday, 8 January 2012
श्रद्धांजली तुम्हें......
हे माँ!!!
सोचती थी कभी
न जाने तुम व्योम को क्यों देखती किस की तलाश थी,
ढूँढा करतीं रीते नयन लिए,अपने भीतर ....
हर पल को तुम
मौन हो कर विचारतीं क्या था वो तुम्हारे भीतर
जिस भाव को मैं अब,
ढूँढा करतीं महसूस करती अपने भीतर......
भटकन शान्त हुई होगी
तुम्हारी अब विलीन होकर
मैं हूँ उस पथ की व्याकुल पथिक-प्राणी जो तुम्हें है,
ढूँढा करती मृग-तृष्णा लिए अपने भीतर.....
हे माँ!!!
सोचती थी कभी
न जाने तुम व्योम को क्यों देखती किस की तलाश थी,
ढूँढा करतीं रीते नयन लिए,अपने भीतर ....
हर पल को तुम
मौन हो कर विचारतीं क्या था वो तुम्हारे भीतर
जिस भाव को मैं अब,
ढूँढा करतीं महसूस करती अपने भीतर......
भटकन शान्त हुई होगी
तुम्हारी अब विलीन होकर
मैं हूँ उस पथ की व्याकुल पथिक-प्राणी जो तुम्हें है,
ढूँढा करती मृग-तृष्णा लिए अपने भीतर.....
Tuesday, 1 November 2011
Friday, 28 October 2011
Tuesday, 11 October 2011
"जननी" को सदा ही मैंने एक बहती धरा माना है, पर आज एक अलग सा रूप देख पा रही हूँ
ना जाने क्यों मन में एक विचार आया क्या वह एक भरा-पूरा कुआँ है ?
जन्म सी उसे बांधते जाते हैं रिश्तों में
अर्थार्त खोदते,गहराते और गोला रूपी दायरे में सिमित करते जाते हैं और
वह गहरा जाती है...जब-तक उसमें स्वयं की अनेक धारायें न निकलती
एक दिन वह बन जाती है भावनाओं से ओत-प्रोत या लबालब कुआँ
जिसका मन आये जब उलीच लो और तृप्त हो लो...
सभी रिश्तों को तृप्त करते हुए वह स्वयं हो जाती है खंगर ...
कभी हर आवाज को लोटाती.आज वह अकेली पड़ी है...रीती पड़ी है....
क्या नियति ने उसे सिर्फ तृप्त करने के लिए रचा है ??
उसके अँधेरे मन में झाँकना तो दूर ,कोई निकट नहीं आना चाहता....
इस रीते कुएँ के पास .......
ना जाने क्यों मन में एक विचार आया क्या वह एक भरा-पूरा कुआँ है ?
जन्म सी उसे बांधते जाते हैं रिश्तों में
अर्थार्त खोदते,गहराते और गोला रूपी दायरे में सिमित करते जाते हैं और
वह गहरा जाती है...जब-तक उसमें स्वयं की अनेक धारायें न निकलती
एक दिन वह बन जाती है भावनाओं से ओत-प्रोत या लबालब कुआँ
जिसका मन आये जब उलीच लो और तृप्त हो लो...
सभी रिश्तों को तृप्त करते हुए वह स्वयं हो जाती है खंगर ...
कभी हर आवाज को लोटाती.आज वह अकेली पड़ी है...रीती पड़ी है....
क्या नियति ने उसे सिर्फ तृप्त करने के लिए रचा है ??
उसके अँधेरे मन में झाँकना तो दूर ,कोई निकट नहीं आना चाहता....
इस रीते कुएँ के पास .......
Sunday, 9 October 2011
तेरे जैसा प्रेम और कहाँ ..?
तेरे नयनों में जैसा प्रेम
अपने लिए कहाँ पाती हूँ,
मुझे हर नयन रीता ही लगता है....
तुझ से एकाकार होने में
मैं स्वयं खो जाती हूँ,
मुझे हर मिलन झूठा ही लगता है
तेरी स्थिरता के आगे
मैं तुझे पा जाती हूँ,
मुझे हर पल ही शून्य लगता है.....
तेरी शक्ति-संचार के आगे
मैं अपने में तेरा एहसास पाती हूँ ,
मुझे तब अपना जीवन ही "एक-भ्रम" लगता है....
अपने लिए कहाँ पाती हूँ,
मुझे हर नयन रीता ही लगता है....
तुझ से एकाकार होने में
मैं स्वयं खो जाती हूँ,
मुझे हर मिलन झूठा ही लगता है
तेरी स्थिरता के आगे
मैं तुझे पा जाती हूँ,
मुझे हर पल ही शून्य लगता है.....
तेरी शक्ति-संचार के आगे
मैं अपने में तेरा एहसास पाती हूँ ,
मुझे तब अपना जीवन ही "एक-भ्रम" लगता है....
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