Friday, 31 August 2012

जी लूँगी मैं भी तेरी अंजली सा -जीवन.....और 
जी लूँगी मैं भी एक-अरुंधती बन 
ना बन पाऊँ, नभ की ज्योत्स्ना तो क्या....
जी लूँगी मैं भी बन कठौती की गंगा 
ना बन पाऊँ , एक निश्छल -सी धारा तो क्या ....
जी लूँगी मैं भी आँगन की मंजरी बन
ना बन पाऊँ , तेरे हृदय की अंतरतम तो क्या .....

Wednesday, 29 August 2012


Tuesday, 28 August 2012

कछु ऐसो साची लिख जाऊँ ....सखी -री...
ना कोऊ ने , ना लिखो ...ऐसो-री....
कोऊ पढ़े तो ऐसो लागे
मैं ना थी, बा-पे बलिहारी....बो -ही परो म्हारे पीछे...बनबारी....
ना थी बाके प्रेम में... मैं बिगरी...
बो ही था म्हारी...भगति पे....न्योछाबर......

Thursday, 2 August 2012


ना जाने तेरी आँखों में, कैसा नूर है
जो मुझे रोशन कर जाता है......
ना जाने तेरे साथ की , कैसी ललक है
जो मेरे अंदर बढ़ती ही जाती है.....

तू तो है म्हारी कस्तूरी ,बसी थी जो म्हारे भीतर,
डोले-भटके बहार जग में ,कबऊ न झाँका अपने भीतर
जों झाँका अपने भीतर,विश्राम करत बैठे -मिले कान्हा बंसी बजावत...
.......प्रार्थना.....

तेरे अर्द्ध-चन्द्र जैसे नयनों में जो, शीतलता देख पा रहीं हूँ,
उनमें मेरा बरबस ही डूब जाने  को जी चाहता है
और क्या चाहूँ तुझ से, बस तेरा हो जाने को जी चाहता है......
....प्रार्थना...

तेरी मधुर -मुस्कान और चंचल नयन
बहुत लुभाते हैं मुझे .......कान्हा ......
कौन सी  कृपा  लिए बैठे हैं मेरे लिए
जो मुझे दोगे तुम, अपना बना के......
.....प्रार्थना.......