जैसे-जैसे मैं उम्र के पड़ाव पार करती जा रही हूँ......
मैं स्वयं को अच्छे से समझ पा रही हूँ,
बहला भी लेती हूँ, मना भी लेतीं हूँ,
चुप भी करा लेतीं हूँ, समझा भी लेतीं हूँ,
गलती भी स्वीकार कर लेतीं हूँ, माफ़ी भी मांग लेतीं हूँ
और....
समभाव में रहने कि कोशिश भी करती रहती हूँ..........
हृदय की बंजर जमीं पर,जब भक्ति की स्नेह वर्षा होती है तो कुछ अंकुर स्वतः ही फूट पड़ते हैं.....उन पल्लवों पर कुछ ओस की बूँदें भावना बन कर उभर जातीं हैं.....बस ये वही आवेग हैं......
Wednesday, 14 March 2012
Sunday, 11 March 2012
"मन के मंजीरे"
आज मैं स्त्री को.....
पौधे के रूप में देख रही हूँ
धूप [दुःख] में खुम्हला जाता है....
छाँव [साथ ] में शाँत रहता है.....
गुड़ाई [वजूद] करने से गहरा जाता है....
सींचने [एहसास] से हरया जाता है....
निहारने [बिना छेड़े] से सकून देता है....
खाद [प्रेम] डालने पर देर तक चलता है ............बस यूँ ...ही......एक ख्याल......
आज मैं स्त्री को.....
पौधे के रूप में देख रही हूँ
धूप [दुःख] में खुम्हला जाता है....
छाँव [साथ ] में शाँत रहता है.....
गुड़ाई [वजूद] करने से गहरा जाता है....
सींचने [एहसास] से हरया जाता है....
निहारने [बिना छेड़े] से सकून देता है....
खाद [प्रेम] डालने पर देर तक चलता है ............बस यूँ ...ही......एक ख्याल......
Saturday, 25 February 2012
जीवन के अभिन्न रंगों में भक्ति का रंग सर्वौच्च है,जो प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का मेल है.....इस रंग के चढ़ने पर जीवन में अभिव्यक्ति का भाव बहने लगता है और यही हमें सरल बनता है......
मेरी लेखनी ने इन्हें लिखने में मेरा साथ कुछ इस तरह से दिया है.......
"तेरे प्रेम की छत्र-छाया पाकर, मैं
हर पल को प्रेम में जी लूँ , मैं
सुख में तेरी कृपा पाऊँ,मैं
और दुःख में भी तेरी डोर से बँधी रहूँ, मैं".......
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मेरी लेखनी ने इन्हें लिखने में मेरा साथ कुछ इस तरह से दिया है.......
"तेरे प्रेम की छत्र-छाया पाकर, मैं
हर पल को प्रेम में जी लूँ , मैं
सुख में तेरी कृपा पाऊँ,मैं
और दुःख में भी तेरी डोर से बँधी रहूँ, मैं".......
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Saturday, 18 February 2012
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