Wednesday, 14 March 2012

जैसे-जैसे मैं उम्र के पड़ाव पार करती जा रही हूँ......

मैं स्वयं को अच्छे से समझ पा रही हूँ,
बहला भी लेती हूँ, मना भी लेतीं हूँ,
चुप भी करा लेतीं हूँ, समझा भी लेतीं हूँ,
गलती भी स्वीकार कर लेतीं हूँ, माफ़ी भी मांग लेतीं हूँ
और....
समभाव में रहने कि कोशिश भी करती रहती हूँ..........

Sunday, 11 March 2012

"मन के मंजीरे"

आज मैं स्त्री को.....
पौधे के रूप में देख रही हूँ
धूप [दुःख] में खुम्हला जाता है....
छाँव [साथ ] में शाँत रहता है.....
गुड़ाई [वजूद] करने से गहरा जाता है....
सींचने [एहसास] से हरया जाता है....
निहारने [बिना छेड़े] से सकून देता है....
खाद [प्रेम] डालने पर देर तक चलता है ............बस यूँ ...ही......एक ख्याल......

Saturday, 25 February 2012

जीवन के अभिन्न रंगों में भक्ति का रंग सर्वौच्च है,जो प्रेम, श्रद्धा और समर्पण का मेल है.....इस रंग के चढ़ने पर जीवन में अभिव्यक्ति का भाव बहने लगता है और यही हमें सरल बनता है......
मेरी लेखनी ने इन्हें लिखने में मेरा साथ कुछ इस तरह से दिया है.......

"तेरे प्रेम की छत्र-छाया पाकर, मैं
हर पल को प्रेम में जी लूँ , मैं
सुख में तेरी कृपा पाऊँ,मैं
और दुःख में भी तेरी डोर से बँधी रहूँ, मैं".......

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मैं भी धरती, सी ही हूँ ...
सूखती हूँ,टूटती हूँ,झरती हूँ,रुनदती हूँ
किसी की आस का मुझे भी इंतज़ार है
कुछ कमी सी, मुझे भी लगती है
राह देखती रहती हूँ,किसी के बरसने का .....

Saturday, 18 February 2012

सपनों को पंख लगा दूँ और नयनों को हकीकत दिखा दूँ......कलमों में स्याही भर दूँ और मन की किताब तुम्हें दूँ...

कानों में गुनगुना दूँ और मुख में मिसरी घोल दूँ .....हृदय में प्रेम भर दूँ और रोम-रोम पुलकित कर दूँ.....

क्यों की मन का पंछी अब उड़ना चाहे....

Tuesday, 7 February 2012

माँ!!!!
अटारी तो है पर छाया नहीं.....
विहंगम तो है पर मधुर स्वर नहीं....
भीड़ तो है पर तुम सा नहीं.....
मैं तो हूँ पर मन में खालीपन लिए.....