Wednesday, 22 May 2013

कुछ मासूम से परिंदे अब भी उड़ते हैं भीतर
चाह की खोज में बंधे ये , जब थक जाते
दुनिया सिमट जाती अपने ही भीतर
उस सिमटी सी , के सिमटे नभ में भी
मीलों की ऊँची उड़ान भरते ये " परिंदे "...
विस्तृत नभ नहीं , बस उड़ान ऊँची होनी चाहिए .....
.......प्रार्थना .......
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Monday, 20 May 2013

ये कोई मामूली " रंग " नहीं ,
सोच के समभाव के प्रतीक हैं ये .....
मन में , हैं जब ऐसे फूल खिलें 
तो मन गहराई में शाँत हो कर 
विचरण कर , लगे खुद से पूछने
अपने वजूद के होने के प्रश्न ??...
इसी रंग में आना और जाना .....
अपनी नियति से ना लड़ो
न उलझो बहते रुख से
खुद को बहा लो थामे पतवार ....
...... प्रार्थना ..

Tuesday, 7 May 2013


मनन ......
" स्त्री ".......इतना लिखा .....कहा ....और सुना जा चुका है कि शब्द अब खोजने पड़ेंगे पर , मुझे लगता है कि लिखने और पढ़ने से ज्यादा समझने की आवश्यकता है और वो भी एक"स्त्री " को , दूसरी "स्त्री " को .......
मुझे लगता है कि इसके भी रिश्तों के आधार पर अग्रसर होते हुए , इसके भी मायने बदल जातें हैं ......माँ के रूप में कुछ और सास के रूप में कुछ ......, बहिन के रूप में कुछ और भाभी के रूप में कुछ ....., बेटी के रूप में कुछ और ननद के रूप में कुछ ...आदि-आदि .......माप दंड क्यों अलग ...अलग हैं ......जिम्मेदारी-कर्तव्य-फर्ज ....कहीं एहसान और कहीं ख़ुशी के साथ करने में बंध जाते हैं ......
हम "स्त्रियाँ " इन सब से अपने को ऊपर क्यों नहीं उठा पातीं ......हम स्वीकारना नहीं आता ......कहीं हम सिर्फ " मैं और हमारे "... में तो नहीं बंध गए ........निश्चय तौर पर हमें अपनी सोच और कर्म की विस्तृता बढ़ानी ही पड़ेगी , नहीं तो जो कल था वो आज हमें नसीब नहीं है और जो आज है ...वो कल हमारे रूप की हमारी ही ..... [बेटियों ] को नहीं मिलेगा ........
" स्त्री तू बस अन्दर और बाहर करुणा की फुहार ही करती रह ,
तुझे अपने आप खोना नहीं वरन खो के ही है ....पा जाना ......अपना स्त्रीत्व ना खोना ......
तेरा यही रूप अद्वतीय ...अमूल्य ...अदभुत ......अतुल्यनीय है " ........
[ बस यूँ ही एक विचार ....]
...........प्रार्थना ............
 

Thursday, 2 May 2013

मनन ......
" अध्यात्म "....एक खोज !!!! ....कर्णप्रिय - विषय ..आजकल .....
मुझसे किसी ने ऐसी किताब के बारे में पूछा जो  इस ओर , उसे ले जा सके या बता ही सके ....तब मेरे मन यह प्रश्न आया क्या कोई किताब यह सिखा  सकता है .... ये एक मानव की इंसानियत की स्वयं के द्वारा खोज है ....यह तो खुद की भी खोज हो सकती है  ......या ये आंतरिक तौर पर समझने का विषय है ????...जिसे हम स्वतः ही जन्म ....पनपा ....अंकुरित ...रोपण या इसका खुद से ही अपने जीवन में अनावरण हटा सकते  हैं .....यह विषय मुझे भी और मेरे मन में भी कई बार  " कौंधता " रहता है ...चलता है  ......या हम इसे मानसिक तौर  पर किया गया गहन अध्यन , सोच , समझ, कर्म और "मैं " से ऊपर उठ कर ???? की सोच ....जो समय , अनुभव और उम्र से जीवन में आने वाली स्थिति  के अनुसार मान लें ......अपितु इसे ईश्वरीय कृपा मान लें ......
मुझे  तो यह एक प्रक्रिया लगती है, जितना डूबेंगे उतना , उतना उबरेंगे .....हाँ अच्छी किताबें भी सहायक हो सकतीं हैं .....मैंने जितना अपने स्तर से समझा है ..... सुख , शान्ति , समन्वय , सामंजस्य ,सोच , स्थिरता , समभाव , सहभागिता ....आदि ...आदि ...की बढ़ोतरी का पथ है .....
[बस यूँ ही एक विचार ...]
.........प्रार्थना ..........

Thursday, 18 April 2013

मनन .....
" मैं "....आखिर क्या है ये " मैं  ".....का परिचय क्या है ?? जो हमने अपने अहं को अपने अंदर बो दिया या इकठ्ठा कर हमारी पहचान बन बैठा है .....शायद इस में बंध कर हम  अपनी सोच और संकुचित दायरे का परिचय देते हैं ... जब हम इस मैं से अपने को बाँध लेते  है तो फिर  इसी के हो कर रह जाते  है .....लेकिन अगर सोंचें कि ....  "सोच " की ऊँची उड़ान के आगे , कितना सूक्ष्म है ...... 
" मन " की गहराई के आगे कितना हल्का है ....." मौन " की परिभाषा के आगे , कितना निशब्द: है ...... "शहीदों "की कुर्बानी के आगे 
कितना स्वार्थी है ......आदि ...आदि .....तो फिर क्या फायदा इस  "मैं "...का…. अपना परिचय बनाना चाहेंगे इसे ???
 { बस यूँ ही एक विचार .....}
........प्रार्थना .

Wednesday, 17 April 2013

कभी जो हम अपने नहीं हुए और अपने आप के ही हो जाना ....
भाने लगा है अब .....
साहिलों की खोज में रहे और मोंजों में घुलना -मिलना ....
आने लगा है अब ....
मंजिल की तलाश में रहते और राह में खोते रहना ही ....
भाने लगा है अब ......
ये जो मन चंचला बन थिरकता और बिन मचले ही स्वयं को .....
थामे रहता है अब .......
......प्रार्थना .......

मेरे सुखसागर के
नीर - नभ - वसुंधरा - पवन - अग्नि ,
मुझ में समाते हैं .....
और समय-समय पर
अपना प्रभाव मुझ में दिखला कर
अक्सर शाँत हो जाते हैं
और उनके बचे हुए अवशेषों को
सहज लेतीं हूँ अपने आँचल में .....
जो मुझे सिखा जाते
जीवन को बेहतर बनाने की कला ......
.....प्रार्थना .........